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वाद्य यंत्रों में से एक भगवान शिव का डमरू,अब विलुप्त होने के कगार पर !

वाद्य यंत्रों में से एक भगवान शिव का डमरू,अब विलुप्त होने के कगार पर !

भरतपुर : भारतीय कला और संस्कृति में अपनी विशेष पहचान रखने वाले पुराने वाद्य यंत्र विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके है. कुछ साल पहले हमारे यहां जब भी शादियां व धार्मिक कार्यक्रमों का अयोजन होता था इन्हीं वाद्य यंत्रों की धुन सुनाई देती थी.अब कंप्यूटर युग में तमाम मनोरंजन के साधनों के चलते यह वाद्य यंत्र फीके दिखाई देते हैं और इन्हें बजाने वाले लोग भी इस कार्य को छोड़ अन्य काम करने में रुचि ले रहे है. लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पुराने वाद्य यंत्रों को बजाने में माहिर होने के साथ इन्हे जीवंत रखे हुए हैं. इन्हीं वाद्य यंत्रों में से एक भगवान शिव का डमरू है. यह एक छोटा वाद्य यंत्र होने के साथ सबसे पहला वाद्य यंत्र भी है. राजस्थान के भरतपुर निवासी देवेंद्र योगी को डमरू बजाने में महारत हासिल है. इस व्यक्ति के द्वारा इस डमरु का प्रदर्शन जागरण व धार्मिक कार्यक्रमों में किया जाता है.

अब यह वाद्य यंत्र धार्मिक कार्यक्रमों तक ही सीमित रह गए है...

डमरु वादक देवेंद्र योगी ने बताया कि यह भगवान शिव का पसंदीदा वाद्य यंत्र था. यही वजह है कि किसी भी धार्मिक कार्यक्रम की शुरुआत होने से पहले भगवान शिव के साथ इस डमरु का भी पूजन किया जाता है. डमरू को बजाने का कार्य मेरे पिताजी के द्वारा किया जाता था .अब उनके बाद इसे बजाने की जिम्मेदारी में संभाल रहा हूं.वही अब यह वाद्य यंत्र धार्मिक कार्यक्रमों तक ही सीमित रह गए है.एक जमाना था जब यह लोगो के लिए मनोरंजन का साधन होता था.लेकिन अब शोर गुल करने वाले डीजे के आगे इनकी चमक फीकी होने से कम ही नजर आते है.

डमरू के नाद से संस्कृत के व्याकरण का हुआ है निर्माण..

शिव के डमरू के विषय में ऐसी मान्यता है कि वह सत, तम , रज इन तीन गुण का प्रतीक माना जाता है. सृष्टि के आरंभ के समय इन तीनों गुण का सामंजस्य बनाए बिना सृष्टि के निर्माण में बाधा आने के वजह से शिव ने इसे डमरू के प्रतीक में पिरो कर अपने पास धारण किया.कालांतर में इसी डमरू के नाद से संस्कृत के व्याकरण का निर्माण हुआ है.